अधूरा इश्क़

abhiFebruary 12, 20191min620
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उस रोज मौत जिंदगी के बेहद करीब से गुजरी थी और वो बाल बाल बच गया था ! उसने अपनी बाइक उठाई फिर हाथों और पैरों से रिश्ते हुए खून को लेकर वो अस्पताल की ओर चला गया !

अस्पताल से लौटते समय उसने ‘बनारसी चाय’ की दुकान पे बाइक को किनारे लगा जेब में हाथ डाला सामने फोन पे 117 छूटी हुई कॉलें फ़्लैश हो रहीं थीं !
यकीनन किसी ने उधर जानकारी दे दी थी ।

अगले ही पल दूसरी ओर से लगातार एक सिसकती हुई आवाज और एक ही सांस में न जाने कितने अनगिनत प्रश्न उसके सामने थे !
उसने कहा – चुप हो जाओ बिल्कुल ठीक हूं मैं !
दूसरी ओर से अपने रुंधे हुए गले और लड़खड़ाई हुई आवाज को साफ करते हुए उसने कहा –
‘जंहा गिरे थे वंही खड़ी हूं मैं’ !

उसने एक भी घूंट पिये बिना चाय का ग्लास नीचे रखा आसमान की ओर देखा अस्ताचलगामी सूर्य और पक्षी दोनो अपने घर जाने की जल्दी में थे !
दिन ढलने को था !

“कुछ हो जाता तो?!”

पहुचनें पर घंटो सिसकती हुई आंखों में सैलाब और चेहरे पर मासूमियत समेटे उसने व्याकुलता भरी आंखों से ये सवाल पूछा !

हर बार की तरह उसके सवालों को सुलझाने की नाकाम सी कोशिश करते हुए इससे पहले की वो कुछ कहता वो खुद बोल पड़ी – न हुआ है और न कभी ऐसा कुछ होगा !

कुछ खाया है ? उसने सवाल पूछा !
नहीं – उसने जवाब दिया ।
उसने उंगली बढ़ाई उसके हाथ पे पट्टियां थी
तो उसने उसे अपनी कलाई थमा दी !

पास के ही एक छोटे से रेस्टोरेंट में सूप आर्डर करते हुए उसने अपनी टिफिन के पराठे निकाल कर सामने रखे !
तभी पीछे से आवाज आई – आर्डर नंबर – 27 !
सूप की ट्रे रखते हुए उसने कहा ये पराठे देखने के लिए नही हैं !
उसने अपना दाहिना हाथ दिखाया !

सामने देखो – और मुंह खोलो !
उसने एक चमच्च सूप टेस्ट करते हुए अपने चेहरे पर एक हल्की मुस्कान के साथ उसकी ओर देखते हुए कहा !
तीन कौर खिलाने के बाद एक छोटा सा टुकड़ा अपने मुंह मे डालते हुए वो अब भी बड़बड़ाये जा रही थी- खुद की भी कोई परवाह नही रहती कोई इतना लापरवाह कैसे हो सकता है ?

तीन और एक के अनुपात में चार पराठे खत्म हो चुके थे !
दो से तीन सिप सूप लेकर उसने बाउल सामने करते हुए खुद से लेने का इशारा किया और सामने पड़ी पॉलिथीन की गांठ खोलते हुए कहा फटाफट दवाइयां लो 8 बज चुके है फिर उधर रिक्शे नही मिलेंगे और आज अब पैदल चलने की हिम्मत नही है ! अपना बैग समेटते हुए उसने आसुंओ से भींगी उसी रुमाल से उसका मुंह पोछा !
निकल रही हूं ख़्याल रखना !

“घर पहुँच जाना तो कॉल करना !
काउंटर पर बिल देते हुए उसने पीछे से कहा !”

दोनों की आखिरी मुलाकात थी शायद वों !

वो रात भर फोन देखता रहा पर घंटी नहीं बजी !
वो पूर्णमासी की उस रात अपनी छत पर बैठ घंटो अपलक चंद्रमा देखता रहा ! उस रात के बाद अमावस्या ने घर कर लिया और फिर चाँद पर लगे ग्रहण ने कभी पूर्णमासी की रात नही आने दी उस रात के बाद उसके दिन फीके से और दोपहरें खंज़र सी हो गयी और हर शाम कुछ टूट सा जाता रहा अन्दर ही अंदर उसके और रात की तन्हाइयो में पैदा होती रहीं उसके अंदर बस कुछ ‘खामोश चीखें’ !

दिन महीनों में और महीनें सालों में गुजरने लगे !
एक शहर से दूसरे शहर गुजरती दुनियाँ ! भागते लोग !
स्टेशनों पे सबको अपनी अपनी मंजिल पर ले जाने वाली गाड़ियों का पता बताती एक आवाज जिसे वो सुनता और मुस्कुरा देता शायद उसकी मंजिल का टिकट कहीं खो गया था उससे ?
सालों बाद जाड़े की एक कड़कड़ाती रात जब वो उसी शहर के रेलवे स्टेशन पे प्लेटफॉर्म नंबर – तीन पर अकेला बैठा अपनी ट्रैन का इंतज़ार का रहा था
तभी उसका फोन बजा!

“ट्रैन टाइम पे है?!” – दूसरी तरफ से आवाज आई !
उसने कहा – 2 घण्टे लेट है ।

सुनो – ?
हां – कहो ?

याद रखना
एक दिन सारे ख्वाब
हिसाब मांगेंगे
कदमों से
रास्तों से
मुश्किलों से
और मंजिलों से भी
तभी तय होंगे
तुम्हारे संघर्ष के दायरे
सोचकर रखना
पगडंडियां
कभी माफ नहीं करती
हारे हुए कदमों
और मुसाफिरों को !

और हां – पहुँचकर कॉल जरूर करना फिक्र रहेगी !
इंतज़ार रहेगा ! शुभ यात्रा रखती हूं !

घंटो से सूनसान पड़े प्लेटफॉर्म पर अचानक काला कोट पहने हुए एक बूढ़े से टिकट कलेक्टर ने सामने आकर मुस्कुराकर पूछा – कहाँ जाना है ?
टिकट तो है न ?

-‘चन्दन’