LOVE Archives - SocialAha

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abhiMay 2, 20191min740

“तुम्हारे मूरत से बढ़कर इस जहाँ में कोई खूबसूरत नहीं है”

मेरे लिए परिवार से बढ़कर

इस जहाँ में कोई दौलत नहीं है

मेरे लिए सम्मान से बढ़कर

इस जहाँ में कोई सोहरत नहीं है ||

हक़ीक़त से वास्ता रखता हूँ

हवा में कोई भी बात नहीं करता

झूठी दिलासा से बढ़कर

इस जहाँ में कोई फितरत नहीं है ||

संदेश चाहे अनुशाशन का हो

या फिर चैन और अमन का हो

आपस की लड़ाई से बढ़कर

इस जहाँ में कोई नफरत नहीं है ||

ए मेरे जीवन के मालिक और

इस जहाँ के रखवाले तुम हो

तुम्हारे मूरत से बढ़कर

इस जहाँ में कोई खूबसूरत नहीं है ||

 

कवि, शायर, ग़ज़लकार और गीतकार
“पवन कुमार उपाध्याय”
#पवन_उपाध्याय


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abhiMay 2, 20191min890

आखिरी पन्ना

मुझे आज भी याद है वह दिन जब वो मुझसे मिली थी तो उसने कहा था बस यार अमन अब और कितना टाइम चाहिए तुम्हें कोई तुम्हें चांस दे या ना दे मगर मैं तुम्हें अब कोई चांस नहीं दे सकती मैंने अपने मॉम डैड को शादी के लिए हां बोल दिया है शायद शायद वह वक्त वह हालात वजह थे कि वह मुझे छोड़ कर चली गई मैंने बहुत कोशिश की रोकने की की प्लीज यार मन्नत मत जा मुझे छोड़ के मैं नहीं जी पाऊंगा तुम्हारे बगैर प्लीज मत जाओ पर शायद मेरी आवाज उसके कानों तक तो गई पर शायद उसके दिल तक ना पहुंच पाई और वह मुझे छोड़ कर चली गई मगर यह कहानी यहीं खत्म नहीं हुई उसके जाने के बाद मैं दिन रात शराब में डूबा रहने लगा मैं अब जिंदगी के उस पड़ाव पर था जहां मेरे जैसे हजारों नौजवान प्यार में चोट खाकर मिला करते हैं मैं रोज शराब पीता घर जाता घर जाते ही मां की डांट गालियां पढ़ती थी और मैंने कभी ध्यान नहीं दिया वह मुझे खाना खिलाती और मैं उल्टियों में बहा देता और फिर वह मेरी उल्टियां साफ करती यह रोज होता था एक रोज तो मेरे हाथों से उनको चोट भी लग गई थी और वह बेचारी करहाते सो गई मगर मुझे क्या परवाह थी मैं तो बस उस लड़की के जाने की गम में डूबा था सालों बीत गए ऐसा ही चलता रहा और उस दिन भी मैं शराब पीकर आया मां ने हर रोज की तरह मुझे खाना खिलाया और सो गई दूसरी सुबह जब मेरी आंख खुली तो देखा कि मेरी मां मेरे पास है ही नहीं बहुत कोशिश की मैंने जगाने की मगर वह ऐसी गहरी नींद सोई कि मैं जगा ही नहीं पाया नई मां मुझे छोड़ गया अब बहुत दूर जा चुकी थी जहां से लौटना शायद मुमकिन नहीं था डॉक्टर से पता चला कि उन्हें सांस की प्रॉब्लम थी और चूल्हे की धुँआ से उनकी हालत बत्तर से और बदतर हो गई और जितना खाना बनाती थी सारा मुझे खिला कर खुद भूखे सो जाती थी तब एक बात समझ में आई कि जिस प्यार को मैं प्यार समझ के हर रोज तड़पता था वह प्यार नहीं बस एक वहम था और जिस की परवाह मैंने कभी नहीं की असल में उसी में रब बसता था आज मेरी मां मेरे पास नहीं है दुनिया की भीड़ में बिल्कुल अकेला हो गया हू क्योंकि जिससे मैंने सच्ची मोहब्बत की थी ना वह मुझे मिल सके और जिसने मुझसे सच्चा प्यार किया ना मैं उसे बचा सका तब एक बात समझ में आई इंसान को जो चीज आसानी से मिल जाती है उसकी कदर कभी नहीं करता आज मेरा कोई नहीं है ये साँसे भी मुझपे बोझ बन गई है बस अब आजाद होना चाहता हूँ दर्द के इस मंजर से रिहा होना चाहता हूँ साँसों की इन जंजीरों से
कहते हैं उस दिन के बाद अमन को किसी ने ना देखा शायद वो उसकी जिंदगी का आखिरी पन्ना था।।

कहते हैं प्यार का नाम सुनकर हर किसी के दिमाग में एक लड़की की तस्वीर बन जाती है क्यूँ किसी को माँ का ख्याल नहीं आता तो आज के बाद जब भी कहीं प्यार मोहब्बत का जिक्र आएगा सबसे पहले आपको आपकी माँ का चेहरा याद आएगा।।

-Aman Tekaria


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abhiFebruary 12, 20191min610

उस रोज मौत जिंदगी के बेहद करीब से गुजरी थी और वो बाल बाल बच गया था ! उसने अपनी बाइक उठाई फिर हाथों और पैरों से रिश्ते हुए खून को लेकर वो अस्पताल की ओर चला गया !

अस्पताल से लौटते समय उसने ‘बनारसी चाय’ की दुकान पे बाइक को किनारे लगा जेब में हाथ डाला सामने फोन पे 117 छूटी हुई कॉलें फ़्लैश हो रहीं थीं !
यकीनन किसी ने उधर जानकारी दे दी थी ।

अगले ही पल दूसरी ओर से लगातार एक सिसकती हुई आवाज और एक ही सांस में न जाने कितने अनगिनत प्रश्न उसके सामने थे !
उसने कहा – चुप हो जाओ बिल्कुल ठीक हूं मैं !
दूसरी ओर से अपने रुंधे हुए गले और लड़खड़ाई हुई आवाज को साफ करते हुए उसने कहा –
‘जंहा गिरे थे वंही खड़ी हूं मैं’ !

उसने एक भी घूंट पिये बिना चाय का ग्लास नीचे रखा आसमान की ओर देखा अस्ताचलगामी सूर्य और पक्षी दोनो अपने घर जाने की जल्दी में थे !
दिन ढलने को था !

“कुछ हो जाता तो?!”

पहुचनें पर घंटो सिसकती हुई आंखों में सैलाब और चेहरे पर मासूमियत समेटे उसने व्याकुलता भरी आंखों से ये सवाल पूछा !

हर बार की तरह उसके सवालों को सुलझाने की नाकाम सी कोशिश करते हुए इससे पहले की वो कुछ कहता वो खुद बोल पड़ी – न हुआ है और न कभी ऐसा कुछ होगा !

कुछ खाया है ? उसने सवाल पूछा !
नहीं – उसने जवाब दिया ।
उसने उंगली बढ़ाई उसके हाथ पे पट्टियां थी
तो उसने उसे अपनी कलाई थमा दी !

पास के ही एक छोटे से रेस्टोरेंट में सूप आर्डर करते हुए उसने अपनी टिफिन के पराठे निकाल कर सामने रखे !
तभी पीछे से आवाज आई – आर्डर नंबर – 27 !
सूप की ट्रे रखते हुए उसने कहा ये पराठे देखने के लिए नही हैं !
उसने अपना दाहिना हाथ दिखाया !

सामने देखो – और मुंह खोलो !
उसने एक चमच्च सूप टेस्ट करते हुए अपने चेहरे पर एक हल्की मुस्कान के साथ उसकी ओर देखते हुए कहा !
तीन कौर खिलाने के बाद एक छोटा सा टुकड़ा अपने मुंह मे डालते हुए वो अब भी बड़बड़ाये जा रही थी- खुद की भी कोई परवाह नही रहती कोई इतना लापरवाह कैसे हो सकता है ?

तीन और एक के अनुपात में चार पराठे खत्म हो चुके थे !
दो से तीन सिप सूप लेकर उसने बाउल सामने करते हुए खुद से लेने का इशारा किया और सामने पड़ी पॉलिथीन की गांठ खोलते हुए कहा फटाफट दवाइयां लो 8 बज चुके है फिर उधर रिक्शे नही मिलेंगे और आज अब पैदल चलने की हिम्मत नही है ! अपना बैग समेटते हुए उसने आसुंओ से भींगी उसी रुमाल से उसका मुंह पोछा !
निकल रही हूं ख़्याल रखना !

“घर पहुँच जाना तो कॉल करना !
काउंटर पर बिल देते हुए उसने पीछे से कहा !”

दोनों की आखिरी मुलाकात थी शायद वों !

वो रात भर फोन देखता रहा पर घंटी नहीं बजी !
वो पूर्णमासी की उस रात अपनी छत पर बैठ घंटो अपलक चंद्रमा देखता रहा ! उस रात के बाद अमावस्या ने घर कर लिया और फिर चाँद पर लगे ग्रहण ने कभी पूर्णमासी की रात नही आने दी उस रात के बाद उसके दिन फीके से और दोपहरें खंज़र सी हो गयी और हर शाम कुछ टूट सा जाता रहा अन्दर ही अंदर उसके और रात की तन्हाइयो में पैदा होती रहीं उसके अंदर बस कुछ ‘खामोश चीखें’ !

दिन महीनों में और महीनें सालों में गुजरने लगे !
एक शहर से दूसरे शहर गुजरती दुनियाँ ! भागते लोग !
स्टेशनों पे सबको अपनी अपनी मंजिल पर ले जाने वाली गाड़ियों का पता बताती एक आवाज जिसे वो सुनता और मुस्कुरा देता शायद उसकी मंजिल का टिकट कहीं खो गया था उससे ?
सालों बाद जाड़े की एक कड़कड़ाती रात जब वो उसी शहर के रेलवे स्टेशन पे प्लेटफॉर्म नंबर – तीन पर अकेला बैठा अपनी ट्रैन का इंतज़ार का रहा था
तभी उसका फोन बजा!

“ट्रैन टाइम पे है?!” – दूसरी तरफ से आवाज आई !
उसने कहा – 2 घण्टे लेट है ।

सुनो – ?
हां – कहो ?

याद रखना
एक दिन सारे ख्वाब
हिसाब मांगेंगे
कदमों से
रास्तों से
मुश्किलों से
और मंजिलों से भी
तभी तय होंगे
तुम्हारे संघर्ष के दायरे
सोचकर रखना
पगडंडियां
कभी माफ नहीं करती
हारे हुए कदमों
और मुसाफिरों को !

और हां – पहुँचकर कॉल जरूर करना फिक्र रहेगी !
इंतज़ार रहेगा ! शुभ यात्रा रखती हूं !

घंटो से सूनसान पड़े प्लेटफॉर्म पर अचानक काला कोट पहने हुए एक बूढ़े से टिकट कलेक्टर ने सामने आकर मुस्कुराकर पूछा – कहाँ जाना है ?
टिकट तो है न ?

-‘चन्दन’