Standard layout


Perfect for most of the websites you could need, with lots of categories and examples laid out.


VIEW NOW


Sport Portal


If you’re a sport editor, or just a sport person then this example could fit you perfectly.


VIEW NOW


News Portal


Perfect for most of the websites you could need, with lots of categories and examples laid out.


VIEW NOW


Magazine Portal


If you prefer flashy colors, a bit magazine-like layout, then this example is perfect for you.


VIEW NOW


shiksha.jpg

PriyamNovember 18, 20191min500

नीमच: कचरा बीनने वाले बच्चों का भविष्य संवारने के लिए प्रशासन की अनूठी पहल सामने आई है। प्रशासन ने एक ही परिसर में हाॅस्टल और स्कूल बनाकर कचरा बीनने वाले बच्चों को एक प्लेटफॉर्म प्रदान किया है। दरअसल ये बच्चे आमतौर पर सरकारी रिकार्ड में शाला त्यागी बच्चों के रुप में दर्ज होकर रह जाते हैं। उनको पढ़ाने और आगे बढ़ाने की न परिवार को चिंता रहती है और न ही जिम्मेदारों को। लेकिन इस बार नीमच में प्रशासन के अधिकारियों की सकारात्मक सोच ने नया करने की कोशिश की है। प्रयास ऐसा हुआ है कि पन्नी, कचरा बीनने वाले बच्चे आम बच्चों के साथ रहकर अपना सुनहरा भविष्य तराशने में जुट गए हैं।

मध्यप्रदेश के नीमच में कचरा बीनने वाले बच्चों की तादाद सरकारी सर्वे के मुताबिक करीब डेढ़ सौ है। कचरा बीनने वाले बच्चे अपने परिवार के लिए आर्थिक रुप से मददगार बन जाते हैं। धीरे-धीरे यही उनका रोजगार भी बन जाता है। लेकिन इस बार वीआर सर्वे में 30 ऐसे बच्चों को चिन्हित किया गया जो कचरा तो बीनते ही थे साथ ही पढ़ाई में भी रुचि रखते थे। जिला पंचायत सीईओ भव्या मित्तल ने इन बच्चों के लिए अनूठी योजना तैयार की।

जिला मुख्यालय पर एक 100 सीटर हाॅस्टल बनाया गया है। जिसमें सामान्य जरुरतमंद बच्चों के साथ कचरा बीनने वाले बच्चों को भी जोडा गया। 25 बच्चों का दाखिला हाॅस्टल में करवा दिया गया। यहां पर उन्हें सुबह उठकर ब्रश करने से लगाकर रात को सोने के लिए गद्देदार बिस्तर तक मिलता है। इसी परिसर में चल रहे प्राथमिक विद्यालय में बच्चों को प्रवेश दिला दिया गया। जहां वे 11 से शाम 4 बजे तक पढते हैं।

पहले जो बच्चे कचरा बीनकर मटरगश्ती किया करते थे अब उन्हें कचरे के ढेरों के आसपास जाना भी पसंद नहीं आता। खास बात यह है कि इनमें से अधिकांश बच्चे हाॅस्टल में ठहरने लगे हैं।
इन बच्चों का कहना है की पहले पन्नी बीनते थे, अब हाॅस्टल में रहना ज्यादा अच्छा लगता है। वे आगे पढना चाहते हैं।

नीमच के कलेक्टर अजयसिंह गंगवार ने कहा की हमने एक कोशिश की है। पन्नी, कचरा बीनने वाले परिवारों के बच्चों के अलावा भी अन्य शिक्षा से वंचित बच्चों के लिए हाॅस्टल प्रारंभ किया है। बच्चों को बेहतर सुविधाएं और शिक्षा देने का उद्देश्य है।

रिपोर्ट- एस. एस. कछावा


IMG_20191118_104215.jpg

Sonu SharmaNovember 18, 20192min400

वी शांताराम के जन्मदिन पर विशेष

नई दिल्ली: वह केवल डायरेक्टर ही नहीं बल्कि, एक्टर, एडिटर और फिल्म प्रोड्यूसर जैसे हर काम में माहिर थे | कई प्रतिभाओं के जानकार थे वह | उन्होंने अपने जीवन के 60 साल फिल्मों के लिए समर्पित किए | उन्होंने फिल्म निर्माण की नई शैली को विकसित किया | फिल्म बनाने के जादूगर और उन्हें सिनेमा जगत का ‘पितामह’ कहा जाता है | आज हम आपको बताने जा रहे हैं वी शांताराम के बारे में | आज उनका 118वां जन्मदिन है | फिल्मों की हर विधा में माहिर वी शांताराम का जन्म 18 नवंबर 1901 में महाराष्ट्र के कोल्हापुर में मराठी परिवार में हुआ था | आज हम आपको इन्हीं महान एक्टर और डायरेक्टर के फिल्मी सफर के बारे में बताएंगे |

वी शांताराम का बचपन से ही रुझान फिल्मों की ओर था

वी शांताराम का मूल नाम राजाराम वानकुदरे शांताराम था | आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी थी | उनका रुझान बचपन से ही फिल्मों की ओर था और वे फिल्मकार बनना चाहते थे | वर्ष 1920 के शुरुआती दौर में वी शांताराम बाबू राव पेंटर की महाराष्ट्र फिल्म कंपनी से जुड़ गए और उनसे फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखीं | उसके बाद शांताराम ने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 1921 में आई मूक फिल्म ‘सुरेख हरण’ से की थी | इस फिल्म में उन्हें बतौर अभिनेता काम करने का मौका मिला था | वी शांताराम ने अभिनेता के तौर पर लगभग 25 फिल्मों में काम किया है. इनमें ‘सवकारी पाश’, ‘परछाईं’, ‘दो आंखें बारह हाथ’, ‘स्त्री’ और ‘सिंहगड़’ जैसी फिल्में शामिल हैं |
यह भी पढ़ें- जन्मदिन विशेष- खिलाड़ी से भी ज्यादा कोच के रूप में मशहूर होकर बन गए ‘गुरु गोपी’

1927 में फिल्म निर्देशन की यात्रा शुरू की

शांताराम ने 1927 में अपनी पहली फिल्म डायरेक्ट की थी | इस फिल्म का नाम ‘नेताजी पालकर’ है | वह कई प्रतिभाओं में माहिर थे और उन्होंने फिल्म निर्माण की नई शैली को विकसित किया | उन्हें सामाजिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि पर अर्थपूर्ण फिल्में बनाने के लिए जाना जाता है |

birthday-special-v-shantaram
birthday-special-v-shantaram

1929 में प्रभात कंपनी की स्थापना की

वर्ष 1929 में शांताराम ने ‘प्रभात कंपनी फिल्मस’ की स्थापना की | प्रभात फिल्म्स का नाम उन्होंने अपने बेटे प्रभात के नाम पर रखा था | इस बैनर पर वी शांताराम ने करीब आधा दर्जन फिल्में बनाईं | जिनमें ‘अयोध्या के राजा’ प्रमुख रही | ‘अमृत मंथन’ को भी दर्शकों ने काफी सराहा | शांताराम को इन्हीं फिल्मों में पहली बार ‘क्लोज-अप’ का इस्तेमाल किया था | उन्होंने 1933 में पहली रंगीन हिंदी फिल्म बनाई थी | वहीं हिंदी फिल्मों में मूवींग शॉट्स और ट्रोली का भी सबसे पहले उन्होंने ही इस्तेमाल किया था | साथ ही एनिमेशन का प्रयोग भी उन्होंने ही शुरू किया था |

छह दशक तक फिल्माें पर राज किया

शांताराम ने अपने छह दशक लंबे फिल्मी करियर में लगभग 92 फिल्में प्रोड्यूस की और लगभग 55 फिल्मों में निर्देशक के तौर पर काम किया | उनकी ‘डॉ. कोटनिस की अमर कहानी’ (1946), ‘अमर भोपाली’ (1951), ‘झनक झनक पायल बाजे’ (1955), ‘दो आंखें बारह हाथ’ (1957), ‘नवरंग’ (1959) और ‘पिंजरा’ (1972) ऐतिहासिक फिल्में रहीं | जिन्हें सिनेमा दर्शक आज भी नहीं भूले हैं |
यह भी पढ़ें- जन्मदिन विशेष: शोले का ‘गब्बर सिंह’ हिंदी सिनेमा के लिए आज भी लकीर बना हुआ है

‘ऐ मालिक तेरे बंदे हम’ आज भी लोकप्रिय

वी शांताराम की फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ सिनेमा दर्शकों में आज भी लोकप्रिय है | इस फिल्म का गाना ‘ऐ मालिक तेरे बंदे हम ऐसे हो हमारे करम’ आज भी खूब सुना और गाया जाता है | यहां हम आपको एक और जानकारी देना चाहेंगे कि दो आंखे बारह हाथ की शूटिंग के दौरान वी शांताराम को आंख में गंभीर चोट भी लगी थी | इस बात का खतरा था कि शांताराम की आंखों की रोशनी चली जाएगी, लेकिन भगवान की दुआ से उनकी आंखों की रोशनी बची रही | उसके बाद फिर उन्होंने फिल्मों में निर्देशन शुरू कर दिया था | ये कमाल वी शांताराम ही कर सकते थे कि उनकी अगली फिल्म जब बनकर तैयार होती थी तब तक उनकी पिछली फिल्म हॉल में लगी रहती थी |

अभिनेता जितेंद्र को भी लॉन्च किया था

वी शांताराम ने ‘गीत गाया पत्थरों ने’ बनाई | इस फिल्म के साथ ही अभिनेता जितेंद्र ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी | इस फिल्म में शांताराम ने अपनी बेटी राजश्री को भी लॉन्च किया था | राजश्री वी शांताराम की दूसरी पत्नी जयश्री से उनकी औलाद थीं | इससे पहले उन्होंने विमलाबाई से विवाह किया था | इस फिल्म एक गाना ‘गीत गाया पत्थरों ने’ बहुत ही लोकप्रिय हुआ था | इसके अलावा सेहरा फिल्म का संगीत खूब पसंद किया गया | फिल्म के लगभग सभी गाने खूब चले | हसरत जयपुरी के लिखे गीत ‘पंख होते तो उड़ आती रे रसिया ओ बालमा’, ‘तकदीर का फसाना’ और ‘तुम तो प्यार हो सजनी’ को लोगों ने खास तौर पर खूब सराहा गया |

70 के दशक में शांताराम की फिल्मों का जादू फीका पड़ने लगा

70 के दशक में वी शांताराम का जादू फीका पड़ने लगा था | समाज ने उनकी फिल्मों को वो प्यार नहीं दिया जो उन्हें मिला करता था | वो लगभग फिल्मों से दूर हो चुके थे |1987 में उन्होंने ‘झांझर’ नाम की एक फिल्म सिर्फ इसलिए बनाई क्योंकि उन्होंने अपने नाती सुशांत रे से वायदा किया था वो उसे फिल्मों में लॉन्च करेंगे | इस फिल्म में पद्मिनी कोल्हापुरे ने भी अभिनय किया था | लंबे फिल्मी जीवन चक्र में वी शांताराम ने तमाम बड़े पुरस्कार हासिल किए | दर्शकों के बीच खास पहचान बनाने वाले महान फिल्मकार वी शांताराम का 88 वर्ष की आयु में 30 अक्टूबर 1990 में निधन हो गया | सही मायने में वह फिल्मों के जादूगर थे, उनकी भरपाई कोई नहीं कर पाया |

दादा साहेब फाल्के और पद्मविभूषण से किए गए थे सम्मानित

नेशनल फिल्म अवॉर्ड उसके बाद फिल्मों के लिए सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहब फाल्के’ पुरस्कार से भी शांताराम को सम्मानित किया गया था | उनके निधन के दाे साल बाद देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण से भारत सरकार ने उन्हें सम्मानित किया था |

शंभू नाथ गौतम


881091-cji-gogoi-e1573821492404.jpg

PriyamNovember 15, 20191min620

नई दिल्ली: देश के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई का आज काम के लिहाज से सर्वोच्च न्यायालय में आखिरी दिन है | हालांकि आज वह रिटायर नहीं हो रहे हैं | लेकिन सर्वोच्च न्यायालय में शनिवार और इतवार को अवकाश रहने के कारण गोगोई का आज ही अंतिम दिन है | 17 नवंबर यानी रविवार को वह रिटायर हो रहे हैं | गोगोई को अपने ऐतिहासिक फैसले सुनाने के लिए याद रखा जाएगा | सीजेआई के रूप में रंजन गोगोई का कार्यकाल साढ़े 13 महीने रहा | इस दौरान उन्होंनें कुल 47 फैसले सुनाए, जिनमें से कुछ ऐतिहासिक फैसले भी शामिल हैं |

रिटायर होने से एक सप्ताह पहले लिखे 4 अहम फैसले

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने रिटायर होने से पहले के आखिरी दिनों में चार अहम फैसले दिए | राम मंदिर के निर्माण को हरी झंडी दी और अब सबरीमाला  राफेल डील और राहुल गांधी के खिलाफ अवमानना केस में अपना फैसला सुना दिया | सीजेआई को अयोध्या मामले, चीफ जस्टिस के ऑफिस को आरटीआई के दायरे में लाने, राफेल डील, सबरीमाला मंदिर और सरकारी विज्ञापन में नेताओं की तस्वीर प्रकाशित करने पर पाबंदी जैसे मामलों पर फैसले देने के लिए हमेशा याद किया जाएगा |

यह भी पढ़ें- महाराष्ट्र में लोकतंत्र का चीरहरण करने के बाद, सरकार बनाने की तैयारी

रिटायरमेंट के अगले दिन ही गोगोई मनाएंगे अपना 65वां जन्मदिन

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई 18 नवंबर को 65 साल के हो जाएंगे और चीफ जस्टिस के रिटायर होने की उम्र 65 साल है | 18 नवंबर को रंजन गोगोई का चीफ जस्टिस पद से रिटायर होने के बाद पहला जन्मदिन होगा | गौरतलब है कि रंजन गोगोई को 3 अक्टूबर 2018 को भारत का का मुख्य न्यायाधीश 46वां नियुक्त किया गया था | गोगोई का 18 नवंबर 1954 को जन्म हुआ था |

वर्ष 1978 में रंजन गोगोई ने वकालत शुरू की थी

रंजन गोगोई ने साल 1978 में बतौर एडवोकेट अपने करियर की शुरुआत की थी | रंजन गोगोई के पिता केशब चंद्र गोगोई असम मुख्यमंत्री रह चुके हैं | जस्टिस रंजन गोगोई ने अपना करियर गुवाहाटी हाईकोर्ट में परमानेंट जज के तौर पर फरवरी 2001 में शुरू किया था |

2010 में उनका ट्रांसफर पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में कर दिया गया जहां 2011 में उन्हें हाईकोर्ट चीफ जस्टिस बना दिया गया | 23 अप्रैल 2012 से वह सुप्रीम कोर्ट के जज हो गए और अब नॉर्थ-ईस्ट भारत से देश के चीफ जस्टिस बनने वाले वो पहले शख्स हैं | डीयू के सेंट स्टीफेंस कॉलेज में हिस्ट्री से ग्रेजुएशन पूरा किया | उन्होंने लॉ की पढ़ाई शुरू करने से पहले यहीं से एमए भी किया था |

शंभू नाथ गौतम


World-Diabetes-Day-1280x720-1024x576-e1573730511740.jpg

PriyamNovember 14, 20192min690

नई दिल्ली: आज 14 नवंबर है | देश में वैसे तो यह तारीख चाचा नेहरू और बाल दिवस के रूप में मनाई जाती है | यहां हम आपको बताना चाहेंगे कि यह दिन डायबिटीज के लिए भी याद किया जाता है | आज ही ‘वर्ल्ड डायबिटीज डे’ भी है | आइए आज इसी के बारे में बात कर लिया जाए | मौजूदा समय में विश्व में तेजी से बढ़ने वाला यह रोग माना जा रहा है | पिछले दो दशक से मधुमेह यानी डायबिटीज की बीमारी देश और दुनिया में बड़ी समस्या बन गई है | पहले इसे शहरी क्षेत्रों की बीमारी मानते थे, लेकिन अब ग्रामीण इलाकों में भी मरीजों की संख्या बढ़ रही है |

भागदौड़ भरी जीवन शैली में बिगड़ते खानपान, व्यायाम की कमी और तनाव की वजह से इसके रोगी भारत समेत विश्व भर में तेजी के साथ बढ़ रहे हैं | पिछले कुछ समय से युवा भी डायबिटीज की गिरफ्त में तेजी के साथ आते जा रहे हैं | इसके दो प्रमुख कारण माने जाते हैं-जेनेटिक, और माेडिफाइबल फैक्टर, जेनेटिक फैक्टर बदला नहीं जा सकता है और माेडिफाइबल फैक्टर का तात्पर्य है कि जीवनशैली व खान-पान में बदलाव लाकर डायबिटीज से बचाव और राहत पाया जा सकता है |

–ये होते हैं माेडिफाइबल फैक्टर–

डायबिटीज दो प्रकार की होती है | टाइप-1 और टाइप- 2 |

डायबिटीज टाइप – 1

मुख्य रूप से जेनेटिक कारणों से होती है और अधिकतर कम उम्र में होती है | जबकि सबसे ज्यादा होने वाली डायबिटीज टाइप -2 के पीछे अनियमित जीवनशैली व गलत खानपान मुख्य वजह माना जाता है | यह मुख्य रूप से 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को ही होती है |

डायबिटीज टाइप-2

डायबिटीज के इस टाइप को जीवनशैली व खान-पान में बदलाव कर नियंत्रित किया जा सकता है | इसे ही माेडिफाइबल फैक्टर कहते हैं | इसके अलावा तनाव (स्ट्रेस) भी डायबिटीज होने का बहुत बड़ा कारण है | स्ट्रेस शरीर में चार तरह के स्ट्रेस हार्मोन का स्तर बढ़ाता है | इसका पैंक्रियाज पर असर होता है | इससे शुगर बढ़ती है और डायबिटीज होती है |

–आइए जानते हैं डायबिटीज में इंसुलिन क्या है, और कैसे बनता है–

डायबिटीज मेटाबॉलिक डिसऑर्डर है | जिसमें इंसुलिन की कमी होती है इसकी कमी से रक्त में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ती है | बढ़ा ग्लूकोज जब रक्त में पहुंचता है तो शरीर में कई तरह की परेशानी होने लगती है | अब आपको बताएंगे इंसुलिन क्या है | इंसुलिन पैंक्रियाज यानी (अग्नाशय) के बीटा सेल्स में बनने और निकलने वाला हार्मोन होता है | जो ग्लूकोज के स्तर को मेटाबॉलिज्म को ठीक रखता है कोशिकाएं ग्लूकोज का उपयोग कर ऊर्जा में बदलती हैं | कैसे बनता है इंसुलिन, यह भी जानिए | इंसुलिन व्यक्ति के शरीर में जरूरत के अनुसार बनता है | व्यक्ति के शरीर, हार्मोन दिनचर्या के आधार पर इसका निर्माण होता है | पैंक्रियाज में शरीर की जरूरत के अनुसार इंसुलिन घटता-बढ़ता रहता है |

–ऐसे पता करें कि डायबिटीज है या नहीं–

शुगर की जांच दो तरह से होती है | पहला फास्टिंग सुबह नाश्ते से पहले और दूसरा पीपी यानी खाने के 2 घंटे बाद | सामान्य व्यक्ति का फास्टिंग ब्लड शुगर 70-100 एमजी-डीएल के बीच, खाने के बाद पीपी 140 से कम और एचबीए1सी, 5.7 से कम होता है | प्री डायबिटीज– फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज 100 से 125 एमजी-डीएल के बीच और खाने के बाद पीपी 140-199 तक और एचबीए1 सी 6.4 है तो खतरा बढ़ गया है | यह प्रीडायबिटीज की श्रेणी में माना जाता है | जिन लोगों का फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज ‘एफबीजी’ 125 एमजी- डीएल से अधिक और खाना खाने के बाद की जांच यानि पीपी 200 एमजी-डीएल से अधिक है | वहीं 3 महीने की जांच एचबीए1सी का लेवल 6.4 से अधिक हो जाता है तब रोगी में डायबिटीज की पुष्टि होती है |

–14 नवंबर को कैसे हुई थी डायबिटीज डे मनाने की शुरुआत–

विश्वभर में 14 नवंबर को वर्ल्ड डायबिटीज डे मनाया जाता है |  इस दिन को मनाने की शुरुआत सबसे पहले इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन और विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा वर्ष 1991 में की गई थी | यह खास दिन डॉ. फ्रेडरिक ग्रांट बैंटिंग के जन्म दिवस पर मनाया जाता है | दरअसल फ्रेडरिक बैंटिंग ने चार्ल्स बेस्ट के साथ  लगभग 100 वर्ष पहले इंसुलिन की खोज की थी | इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन के अनुसार आज के समय में लगभग 425 मिलियन से अधिक लोग डायबिटीज से पीड़ित है |

–अपनी सेहत का रखें खास ध्यान —

डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है जिससे पीड़ित व्यक्ति को अपनी सेहत का खास ध्यान रखना पड़ता है | हाल ही में हुए एक शोध में पता चला है कि लंबे कद वाले पुरुषों में 41 फीसदी और महिलाओं में 33 फीसदी डायबिटीज का खतरा कम होता है | जबकि शोध की मानें तो छोटे कद वाले के लोगों के बीच डायबिटीज का खतरा ज्यादा बना रहता है |

–डायबिटीज के ये हैं लक्षण–

  1. वजन ज्यादा होने पर डायबिटीज का खतरा ज्यादा हो जाता है |
  2. हाई ब्लड प्रेशर की समस्या होने पर भी व्यक्ति इस रोग के चपेट में आ सकता है |
  3. शरीर में कोलेस्ट्रॉल बढ़ने पर भी डायबिटीज का खतरा बना रहता हैं |
  4. प्रेग्नेंसी के समय मां को डायबिटीज हो तो भविष्य में बच्चे को भी डायबिटीज हो सकता है |
  5. दिल का रोग या 40 साल से ज्यादा उम्र होने और लाइफ स्टाइल ठीक नहीं होने पर भी डायबिटीज का खतरा बना रहता है|

–डायबिटीज से बचने के ये हैं उपाय–

  1. नशा करने से बचें-सिगरेट और शराब की लत कैंसर, डायबिटीज और हार्ट संबंधी बीमारियों को जन्म दे सकती है |
  2. मोटापा जरूरत से ज्यादा मोटापा डायबिटीज के खतरे को बढ़ा देता है | इससे बचने के लिए हेल्दी और सेहतमंद चीजें खाइए |
  3. दिनभर सिर्फ आराम ही न करें, दिनभर आराम करने और अनहेल्दी डाइट का सेवन करने से भी डायबिटीज हो सकती है | इससे बचने के लिए रोजाना व्यायाम करते हुए हेल्दी डाइट को रुटीन में शामिल करें |
  4. सबसे महत्वपूर्ण यह भी है कि डायबिटीज के प्रति हर दिन जागरूक रहें और इसको अपने ऊपर हावी न होने दें |
  5. समय-समय पर शरीर की जांच और डॉक्टर से परामर्श लेते रहें | साथ ही दवाइयों के चयन पर भी गंभीर रहें |

शंभू नाथ गौतम


FERWSRF.jpg

Sonu SharmaNovember 14, 20191min611

नई दिल्ली: 14 नवंबर को देश में बाल दिवस यानी की चिल्ड्रन्स डे (Children’s Day) के रूप में मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बाल दिवस पहले 14 नवंबर को नही बल्कि 20 नवंबर को मनाया जाता था जी हां.. 1964 तक बाल दिवस 20 नवंबर को ही मनाया जाता था साथ ही बता दें कि आज भी कई देशों में 20 नवंबर को ही बाल दिवस मनाया जाता हैं। लेकिन सोचने वाली बात हैं कि ये तारीख भारत में क्यों बदल दी गई।

दरअसल इसके पीछे एक महत्वपूर्ण कारण था कारण यह था की 14 नवंबर को देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु का जन्मदिन होता है। देश का हर इंसान बखूबी जानता हैं कि पंडित जवाहर लाल नेहरु को बच्चों से कितना प्यार था। इसलिए नेहरु जी के निधन के बाद उनके जन्मदिन को बाल दिवस यानी चिल्ड्रन्स डे के रूप मे मनाने के फैसला लिया। आज के दिन पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन के साथ ही स्कूलों में कार्यक्राम आयोजित किए जाते हैं। स्कूलों में बच्चों को अलग अलग तरह के खेल खिलाते है और गिफ्ट दिए जाते हैं।
यह भी पढ़ें- क्यों लगाया जाता है राष्ट्रपति शासन, अब तक कितनी बार भारत में हुआ ऐसा

आईए आपको बतातें हैं कि भारत में बाल दिवस का क्या इतिहास हैं..

दरअसल भारत में बाल दिवस मनाने का जो कार्यक्राम है वो बहुत पुराना है। 27 मई 1964 को जब पंडित जवाहरलाल नेहरु का निधन हुआ तो उनके बच्चों के प्रति प्यार को देखते हुए सर्वसम्मति से फैसला किया गया कि हर साल 14 नवंबर को चाचा नेहरू के जन्मदिवस पर बाल दिवस मनाया जाएगा। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू बच्चों में भारत का भविष्य देखते थे और उनसे स्नेह रखते थे। उनका मानना था कि बच्चे देश का भविष्य है इसलिए उन्हें प्यार दिया जाना चाहिए और उनकी देखभाल करनी जरूरी है। बच्चे प्यार से पंडित जी को चाचा नेहरू बुलाते थे।
यह भी पढ़े- 370 हटने के बाद जम्मू कश्मीर में आजादी की नई सुबह

14 नवंबर को ही क्यों मनाया जाता है बाल दिवस?

 

यह तो हर कोई जानता था कि नेहरू जी को बच्चों से कितना प्यार था। नेहरू जी को जब भी समय मिलता था वो बच्चों से मिलने निकल जाते और उनसे बात करने लगते थे। लेकिन 27 मई 1964 को यह सब एक दम से थम गया। इसके बाद फैसला लिया गया की उनके जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जाएगा, यह फैसला लेने की वजह यह भी है कि इस दिन हर साल बच्चे उन्हें याद करें, उन्हें अपने बीच में पाए और आने वाली पीढ़ी बच्चों के लिए उनके प्यार को समझ पाए। पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 को इलाहबाद में हुआ था।

आपको जानकर हैरानी होगी की बाल दिवस 1925 से मनाया जाने लगा था। लेकिन इसकी कोई अधिकारिक घोषणा नहीं हुई थी। 20 नवंबर 1954 को यूएम ने पहली बार बाल दिवस यानी की चिल्ड्रन्स डे की घोषणा की थी और, इसी कड़ी में भारत में बाल दिवस को 14 नवंबर को मनाने का फैलसा किया गया था। हमारी तरफ से भी देश के हर व्यक्ति को बाल दिवस के हार्दिक शुभकामनाएं। आज आप भी नेहरू की तरह बच्चों के खुब प्यार दें।


pic-1-e1573644315997.jpg

PriyamNovember 13, 20191min490

नई दिल्ली: महाराष्ट्र में सीएम पद को लेकर लंबे समय से हो रही खींचातान को देखते हुए महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की। जिसको राष्ट्रपति ने अगले 6 महीने के लिए मंजूरी दे दी है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है इस दौरान सत्ता की बागडोर राज्य के राज्यपाल के पास चली जाती है।

राष्ट्रपति शासन कब लगाया जाता है

*किसी राज्य में अगर असेंबली इलेक्शन में अगर कोई भी पार्टी अपनी दम पर या अपने सहयोगियों के साथ बहुमत में आकर सरकार नहीं बना पाए। *या फिर किन्हीं कारणों से चुनाव नहीं हो पाता है और अगर राज्य की विधानसभा अपना नेता नहीं चुन पाती है तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है। *इसके अलावा अगर किसी राज्य की गठबंधन की सरकार बीच में ही टूट जाए और अन्य दल अपना दावा ठोस नहीं कर पाए तो फिर राज्य में राष्ट्र्पति शासन लगाया जाता है।

यह भी पढ़ें- महाराष्ट्र में लगा राष्ट्रपति शासन, शिवसेना पहुंची सुप्रीम कोर्ट

आपको ज्ञात हो कि हाल ही में महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी और बीजेपी का गठबंधन टूटने के बाद राष्ट्रपति शासन लगाया गया। उसके बाद आर्टिकल 370 की समाप्ति और राज्य को केंद्र शासित प्रदेश बनाने से तो आप सब ही रूबरु होंगे।

महाराष्ट्र में पहली भी हुआ ऐसा

आपको बता दें महाराष्ट्र में इससे पहले भी दो बार राष्ट्रपति शासन लगाया जा चुका है। पहली बार 1980 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार के पास विधानसभा में पुर्ण बहुमत होने के बाद भी केंद्र में काबिज इंदिरा गांधी सरकार ने विधानसभा को भंग कर दिया था। इसके पीछे की वजह बिगड़ते राजनीतिक हालात थे और इसी वजह से महाराष्ट्र में पहली बार 17 फरवरी 1980 से 8 जून 1980 यानी 112 दिन तक राष्ट्रपति शासन बरकरार रहा।

socialahaइसी तरह दूसरी बार 28 सितंबर 2014 को भी महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाया गया था। उस वक्त राज्य में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की सरकार थी। मुख्यमंत्री के पद को लेकर दोनों पार्टी अलग हो गई थीं और इसी के साथ विधानसभा भंग कर दी गई थी। ऐसे में 28 सितंबर 2014 से लेकर 30 अक्टूबर 2014 तक यानि 32 दिनों तक राज्य में दूसरी बार राष्ट्रपति शासन लागू रहा।

किस पीएम के कार्यकाल में कितनी बार लगाया गया राष्ट्रपति शासन

  • जवाहरलाल नेहरू (अगस्त 1947 से मई, 1964)- 8
  • लाल बहादुर शास्त्री (जून, 1964 से जनवरी, 1966)- 1
  • इंदिरा गांधी (जनवरी, 1966 से मार्च, 1977)- 35
  • मोरारजी देसाई (मार्च, 1977 से जून, 1979)- 16
  • चरण सिंह (जुलाई, 1979 से जनवरी, 1980)- 4
  • इंदिरा गांधी (जनवरी, 1980 से अक्टूबर, 1984)- 15
  • राजीव गांधी (अक्टूबर, 1984 से दिसंबर, 1989)- 6
  • वीपी सिंह (दिसंबर, 1989 से नवंबर, 1990)- 2
  • चंद्रशेखर (नवंबर, 1990 से जून, 1991)- 5
  • पीवी नरसिन्हा राव (जून,1991 से मई, 1996)- 11
  • एचडी देवेगौड़ा (जून, 1996 से मई, 1997)- 1
  • अटल बिहारी वाजपेयी (मार्च, 1999 से मई, 2004)- 5
  • मनमोहन सिंह (मई, 2004 से मई, 2014)- 12
  • नरेंद्र मोदी (मई, 2014 से अबतक)- 3

lomon_water3_175499.jpg

PriyamNovember 13, 20191min560

नई दिल्ली: अमूमन बहुत से लोग सुबह-सुबह खाली पेट नींबू पानी पीते हैं जिससे फैट कम किया जा सके। नींबू न सिर्फ हमारी सेहत के लिए फायदे मंद है बल्कि ये विटामिन सी का भी अच्छा स्रोत होता है। जिससे हमारी इम्यूनिटी पॉवर बढ़ती है साथ ही हमारी स्किन के लिए भी फायदेमंद होता है।

अत्यधिक नींबू का इस्तेमाल सेहत के लिए हानिकारक

इसके साथ ही नींबू का प्रयोग सब्जी और सलाद में भी खूब किया जाता है. जिससे खाने का स्वाद बढ़ाया जा सके। लेकिन अत्यधिक नींबू पानी या नींबू का इस्तेमाल आपकी सेहत के लिए कितना हानिकारक है इसके बारे में आप नहीं जानते होंगे। तो चलिए आज हम आपको नींबू पानी से होने वाली परेशानियों के बारे में बताते हैं। जो यकीनन आपकी सेहत के लिए बहुत जरूरी हैं।

यह भी पढ़ें- तांबे के बर्तन में रखे पानी को पीने के फायदे

नींबू का रस दांतों को नुकसान पहुंचता है

दरअसल, अत्यधिक नींबू का रस पीने से आपके दांत खराब हो सकते हैं. ये बात हम नहीं कह रहे बल्कि कई शोध में इस बात का खुलासा हुआ है कि नींबू पानी पीने से आपके दांत खराब हो सकते हैं क्योंकि इसमें साइट्रिक एसिड पाया जाता है। जो दांतों के लिए नुकसानदायक होता है। बता दें कि संतरा, नींबू, चकोतरा और मौसमी जैसे फल साइट्रिक एसिड का स्रोत होते हैं। इन सभी फलों का स्वाद खट्टा होता है, साइट्रिक फलों के रुप में इनकी पहचान का एक तरीका यह भी है। नींबू का रस या संतरे का जूस पीने से दांतों को नुकसान पहुंचता है।

दांतों की सफेद चमक होती है कम

बता दें कि खट्टे फलों के रस में मौजूद साइट्रिक एसिड हमारे दांतों की उपरी परत यानि टूथ एनेमल को कमजोर कर देता है। इसके चलते दांतों की सफेद चमक कम होने लगती है और दांतों पर दाग-धब्बे दिखने लगते हैं और आपके दांत दिखने में बहुत ही भद्दे नजर आने लगते हैं।


copper.jpg

Sonu SharmaNovember 13, 20191min650

नई दिल्ली :  हमारी सेहत और उम्र का सीधा संबंध हमारे खानपान से है। हम जैसा खाते हैं हमारा शरीर वैसा ही हो जाता है। यही नहीं ये हमारी जिंदगी पर भी निर्धारित करता है कि अच्छा और सेहतमंद खाना खाने से हम कितने सालों तक जिंदा रहेंगे और बेकार यानी बिना पौष्टिकता वाला खाने से हम कितने दिन जिएंगे। इन्हीं खानपान में शामिल है पानी। जो हमारे शरीर के लिए बेहद फायदेमंद है। लेकिन आज हम आपको तांबे के गिलास या तांबे के किसी भी बर्तन में पानी पीने के फायदों के बारे में बताने जा रहे हैं।

वैज्ञानिक भी तांबे के बर्तनों का करते है इस्तेमाल

Health benefits of copper pot water_SOCIALAHA.COM

प्राचीन काल में भी तांबे से बने बर्तनों का प्रयोग बहुत ही पवित्र माना जाता था। यही नहीं अभी भी किसी भी पूजा या हवन और भगवान की आराधना में जिन बर्तनों का प्रयोग किया जाता है वह सिर्फ तांबे के ही बने होते हैं। वहीं वैज्ञानिक भी तांबे के बर्तनों के इस्तेमाल को अच्छा मानते हैं। इन चीजों का हजारों साल पहले ही वेदों में भी खोज लिया गया था। जिस पृथ्वी ग्रह पर हम रह रहे हैं, उसके अलावा भी ब्रहृांड में बहुत सारे ग्रह मौजूद हैं। जिनका उल्लेख वर्षो पहले महान ऋषि-मुनियों ने अपनी रचनाओं में किया गया था।

यह भी पढ़ें- इस बीमारी से हैं ग्रसित तो भूलकर भी न खाएं अनार

इसी तरह तांबे के इस्तेमाल को भी प्राचीनकाल में भी अच्छा माना था। बैक्टीरिया यानी की कीटाणुओं का हमारे आसपास मौजूद हाने का दावा आयुर्वेद द्वारा आधुनिक विज्ञान से बहुत पहले ही अपनी रचनाओं में किया गया था। इस बात को साबित करने का सबसे पहला उदाहरण है आयुर्वेद द्वारा तांबे के बर्तन में पानी पीने का महत्व।

बता दें कि मनुष्य के स्वास्थ्य को महत्वपूर्ण समझते हुए आयुर्वेद तांबे के बर्तन में ही पानी पीने की सलाह देता है। आयुर्वेद का यह मानना है कि पानी में विभिन्न प्रकार के कीटाणु होते हैं जो तांबे से बने हुए बर्तन में पानी को डालने से मर जाते हैं। यही नहीं इस खोज को सालों बाद विज्ञान द्वारा भी किया गया।

यह भी पढ़ें- पालक के सेवन से हो सकती हैं ये गंभीर बीमारियां

कम-से-कम चार घंटे तक तांबे के बर्तन में रखे पानी

पानी की अपनी स्मरण-शक्ति होने के कारण हम इस बात पर ध्यान देते हैं हें कि उसको कैसे बर्तन में रखें। अगर आप पानी को रात भर या कम-से-कम चार घंटे तक तांबे के बर्तन में रखकर पीते हैं तो तांबे के कुछ गुण उस पानी में समा जाते हैं। ताम्बे के बर्तन में रखा पानी रोजाना पीने से कब्ज की समस्या से छुटकारा मिलता है। वहीं मधुमेह के मरीजों के लिए भी तांबे के बर्तन में रखा पानी रामवाण की तरह काम करता है।

इसके साथ ही इस पानी से शरीर की जरूरत के हिसाब से कॉपर भी मिल जाती है और बीमारी पैदा करने वाले जीवाणुओं से आपकी रक्षा कर आपको पूरी तरह से स्वस्थ बनाए रखने में मदद करता है। इसके अलावा तांबे में एंटी-इन्फ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं जो शरीर में दर्द, ऐंठन और सूजन की समस्या से निजात दिलाते हैं। ऑर्थराइटिस की समस्या से निपटने में भी तांबे का पानी अत्यधि‍क फायदेमंद होता है।

श्वेता शर्मा


j3.jpg

Sonu SharmaNovember 13, 20191min410

नई दिल्ली: बॉलीवुड की यह अभिनेत्री फिल्मी पर्दे पर कॉमेडी हो या रोमांटिक चाहे गंभीर भूमिकाएं ही क्यों न हो अपने आपको ढाल लेतीं थीं। उसकी चुलबुली हंसी से दर्शक इतने दीवाने हुए कि इस अदाकारा को रातों-रात स्टार बना दिया। हम आज बात करेंगे हिंदी सिनेमा की सबसे खूबसूरत अभिनेत्रियों में शुमार रही जूही चावला की। आज जूही चावला का 52वां जन्मदिन है। 13 नवंबर 1967 को जूही का पंजाब के अंबाला में जन्म हुआ था। पिता सरकारी अफसर थे। जूही चावला ने बचपन की पढ़ाई पंजाब में ही थी। उसके बाद उनका पूरा परिवार मुंबई शिफ्ट हो गया। जूही ने बॉम्बे के फोर्ट कॉन्वेंट स्कूल में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और सिडेनहम कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

जूही की ‘मिस इंडिया’ से बनी पहचान 

juhi chawla_socialaha
                                                

जूही चावला ने स्नातक करने के बाद मिस इंडिया प्रतियोगिता में भाग लिया और वर्ष 1984 में जूही ‘मिस इंडिया’ बन गई। इसी के साथ जूही की पहचान बढ़ने लगी।
वर्ष 1986 में जूही ने पहली हिंदी फिल्म ‘सल्तनत’ से डेब्यू किया था। इस फिल्म में शशि कपूर के बेटे करण कपूर हीरो थे। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई। उसके बाद 1987 में जूही चावला ने साउथ की फिल्म ‘प्रेमलोका’ में अभिनय किया, यह फिल्म सफल रही थी।

यह भी पढ़ें- जन्मदिन विशेष: शोले का ‘गब्बर सिंह’ हिंदी सिनेमा के लिए आज भी लकीर बना हुआ है

कयामत से कयामत तक फिल्म ने जूही को शिखर पर पहुंचा दिया 

 juhi chawla_socialaha.com

वर्ष 1987 में ही निर्माता-निर्देशक ताहिर हुसैन और उनके भाई मंसूर खान आमिर खान को फिल्मी पर्दे पर डेब्यू करने करने जा रहे थे | अपनी निर्माणाधीन फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ के लिए ताहिर ने आमिर खान के साथ जुही चावला को यह रोल ऑफर किया | इतने बड़े निर्माता-निर्देशक के साथ काम करने के लिए जूही ने तुरंत ही हां कर दिया | जूही का यह फैसला उनकी फिल्मी जीवन के सफर में ‘मील का पत्थर’ साबित हुआ | वर्ष 1988 में रिलीज हुई फिल्म कयामत से कयामत तक जबरदस्त सुपर हिट रही | इस फिल्म में दर्शकों ने जूही चावला के अभिनय की जबरदस्त सराहना की | यहीं से जूही चावला को रातों रात स्टार बना दिया | अब जूही चावला 90 के दशक में चुलबुली लड़की के किरदार में दर्शकों के दिलों पर राज करने लगी | इस फिल्म के लिए जूही को ‘बेस्ट डेब्यूट फीमेल’ का अवार्ड भी दिया गया था |

शाहरुख खान के साथ जूही चावला की जोड़ी दर्शकों ने खूब पसंद की 

juhi chawla_socialaha.com

कयामत से कयामत तक फिल्म में मिली अपार सफलता के बाद जूही चावला ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और फिल्मी पर्दे पर हर प्रकार के किरदारों में बखूबी अपने आपको ढाल लिया था | जूही बॉलीवुड की वो शख्सियत है जिन्होंने अपनी फिल्मों से लाखों लोगों के दिल जीते है, फिर चाहे वो कोई कॉमेडी मूवी हो या फिर रोमाटिंक हो | जूही चावला और शाहरुख खान की जोड़ी दर्शकों ने खूब पसंद की | उनकी जो केमेस्ट्री हमारे सामने आती है वो बहुत ही दिलचस्प होती है | फिर चाहे वो फिल्म राजू बन गया जेंटलमैन, रामजाने, डुप्लीकेट, या फिर यस बॉस हो | जूही ने बॉलीवुड के अलावा बंगाली, पंजाबी, मलयालम, तमिल, कन्नड़ और तेलुगु भाषा की फिल्मों में भी अपने अभिनय के जौहर दिखाए |

जूही की सुपरहिट फिल्में 

Juhi Chawla_socialaha

कयामत से कयामत तक, राजू बन गया जेंटलमैन, प्रतिबंध, बोल राधा बोल, हम हैं राही प्यार के, आईना, डर, रामजाने, दीवाना मस्ताना, यस बॉस, इश्क, स्वर्ग, लुटेरे समेत 100 से अधिक फिल्मों में जूही चावला ने अभिनय किया | हम हैं राही प्यार के और डुप्लीकेट के लिए भी जूही को बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड भी दिया गया |

यह भी पढ़ें- अक्षय कुमार की नई फिल्म बेल बॉटम का फर्स्ट लुक आया सामने

उद्योगपति जय मेहता से की शादी 

juhi chawla_socialaha.com

 

12 साल फिल्मी करियर के बाद जूही चावला ने 1998 में उद्योगपति जय मेहता के साथ शादी कर ली | उन्हें एक बेटी ‘जाह्नवी’ और बेटा’ अर्जुन’ है | उसके कुछ वर्ष बाद जूही चावला ने फिर फिल्मी पर्दे पर वापसी की | झंकार बीट्स, गुलाब गैंग और माई ब्रदर निखिल, में शानदार अभिनय किया | फिल्मों के साथ साथ जूही चावला ने टीवी पर ‘झलक दिखला जा’ के सीजन 3 को जज भी किया था और शाहरुख खान के साथ मिलकर फिल्म प्रोडक्शन में भी कदम रखकर ‘फिर दिल है हिंदुस्तानी, अशोका और चलते-चलते’ फिल्में प्रोडयूस भी की | उनकी कंपनी रेड चिलीज एंटरटेनमेंट के तहत शाहरुख खान के साथ साझेदारथी है |

दो साल में बहन-भाई की मौत से लगा था जूही को बड़ा सदमा 

वर्ष 2012 और 2014 में अभिनेत्री जूही चावला के लिए बहुत ही कष्टदायक रहे | इन दो वर्षों में जूही ने अपने भाई, बहन को खो दिया | जूही एक भाई और 2 बहन थी | जूही दोनों से बहुत प्यार करती थी | जूही की बहन सोनिया को कैंसर था जिससे उनका निधन 30 अक्टूबर 2012 को हो गया था | जैसे तैसे जूही इस गम से उभरी | जूही चावला के भाई बॉबी चावला रेड चिलीज एंटरटेनमेंट के सीईओ थे | डिनर पार्टी के बाद 2010 में उन्हें एक स्ट्रोक आया | चार साल तक कोमा में रहने के बाद 9 मार्च 2014 को उनकी मृत्यु हो गई थी | जूही ने 2 साल में अपने सबसे करीबी भाई और बहन खो दिए | जिससे यह अभिनेत्री पूरी तरह टूट गई थी |

शंभूनाथ गौतम