क्यों है खास ‘शीरोज हैंगआउट’ कैफे, जानकर आप भी जाना चाहेंगे यहां

नई दिल्ली- क्यों छुपाना पर्दे से अपना चेहरा, क्या वो इंसान किसी कमरे में बंद है। क्या वो इंसान कही छुपकर बैठा है। वो इंसान तो अपने दोस्तो से कह रहा है मना कर रही थी लड़की, अपनी सुंदरता के आगे मुझे कुछ समझ नही रही थी इसलिए मैने तो उसका चेहरा ही जला दिया फैंक आया उसके चेहरे पर तेजाब,,,,

उनकर गुस्सा आता है ना… लेकिन उन लड़कियों क्या जो इस हादसे का शिकार हुई है। अपने दर्द के चलते ऐसी कुछ लड़कियों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया तो कुछ ने अपने चेहरे को ही छुपा लिया। लेकिन अब चेरहा छुपाने वाली लड़कियां ही सामने आकर समाज से लड़ रही है।खुद को पहचान दे रही है।

लखनऊ में शीरोज हैंगआउट कैफ़े है जहां लड़कियां एसिड अटैक से लड़कर एक नई ज़िन्दगी का आग़ाज़ कर चुकी हैं। दया और खौफ से आगे बढ़ने की हिम्मत जुटाना बहुत दूर की बात है, हम में कई तो इससे आगे की सोच भी नहीं पाते। खाने का आपका ऑर्डर लेने से लेकर इसे परोसने तक का सारा काम कुछ ऐसी युवतियां-महिलाएं करती हैं। जो खुद एसिड हमले की शिकार रही हैं। शीरोज हैंगआउट कैफ़े में इन्हें आवाज ही नहीं मिली है बल्कि इनके सपनों को भी पंख लग गए हैं।

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सबसे पहले आपको इस कैफे के नाम के बारें में बताएं आप सोच रहे होगे ना की शीरोज हैंगआउट ही क्यों चुना इस कैफे का नाम.. तो शी(she) हीरोज(herose) अब शायद आप समझ गए हो गए। ये नाम इस कैफे में काम करने वाली जिंदादिल लड़कियों को दिया गया है। ये सभी लड़कियां अपने अतीत को भूल कर अपनी एक नई पहचान को यहां ढूंढ रही है।

यहां की हर लड़की के चेहरे पर आपको प्यारी सी स्माइल देखने के लिए मिल जाएगी। जिसको देखकर आपके पूरे दिन की थकान मिनटों मे दूर हो जाएगी। कहते है कही जोओ और वहां कोई प्यार से स्माइल ही कर दे तो वैसे ही वहां बैठने का मज़ा दूगना हो जाता है।

कई लोग तो वहां चाय-नाश्ता करने नहीं, बल्कि उन लड़कियों से बात करने आते है। अब बात करें कैफे की तो इस कैफे की शुरुआत आलोक दीक्षित और c की। ‘स्टॉप एसिड अटैक’ नाम का अभियान चलाने वाली यह जोड़ी एसिड हमलों के शिकार पीड़ितों के लिए छांव नाम का फाउंडेशन चलाते हैं।

छांव फाउंडेशन की डायरेक्टर भी एक एसिड अटैक पीड़ित लक्ष्मी हैं। यहां पर जो भी एसिड अटैक पीड़ित आती हैं वो अपनी मर्जी से जो काम करना चाहे, करती हैं। ये एक परिवार बन चुका है.. कहते है न- ‘मैं चलता गया और कारवां बनता गया…’ यही हुआ इन लोगों के साथ भी… आज यहां न जाने कितने लोग हैं जो एक परिवार की तरह रहते हैं। इस कैफ़े में खान पान के अलावा यहां काम करने वाली लड़कियों के हुनर का भी प्रदर्शन किया गया है।

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सिर्फ लखनऊ ही नही बल्कि एसिड अटैक की शिकार महिलाओं के लिए स्टॉप एसिड अटैक अभियान चलाने वाली लक्ष्मी और उनके साथी आलोक दीक्षित ने कई जगह पर ऐसे कैफे की शुरूआत की है। अभी कुछ महीनों पहले ही इन्होंने उदयपुर में कैफे ‘शीरोज हैंगआउट’ शुरू किया है।

शीरोज हैंगआउट में एक साथ 30 लोग तक बैठ सकते हैं शीरोज हैंगआउट के मेन्यू में चाय और कॉफी के अलावा कई तरह के शेक भी हैं। यहां के मेन्यू में टोस्ट, नूडल्स, फ्रेंच फ्राई, बर्गर, विभिन्न तरह के सूप, डेजर्ट और दूसरी कई चीजें खाने पीने को मिल जाएंगी।

शीरोज हैंगआउट की खास बात ये है कि इनके मेन्यू में किसी भी फूड आइटम का दाम नहीं रखा गया है। ये कैफ़े ‘पे ऐज़ यू विश’ मॉडल पर आधारित है, यानी बिल अपनी मर्जी से दो। शीरोज में खान-पान के अलावा बहुत कुछ हैय़ कैफ़े में आपको बुटीक, किताबों से लेकर हैंडीक्राफ्ट तक के सामान मिलते हैं।

लक्ष्मी के ऊपर 16 साल की उम्र में एसिड अटैक हुआ था। उन्हीं की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने एसिड की खुलेआम बिक्री पर रोक लगा दी थी। एसिड अटैक पीड़ितों को नई राह दिखाने में जुटीं लक्ष्मी को 2014 में मिशेल ओबामा ने ‘इंटरनेशनल वुमन ऑफ करेज’ सम्मान से नवाजा था।

शीरोज हैंगआउट के आइडिया को हकीकत बनाने में कई बाधाएं आईं, जो आर्थिक से लेकर सामाजिक सोच तक की थीं। इस कैफे को आगरा में एक महीने के ट्रायल पर शुरू किया गया, पर इसे सोच से भी कई गुणा ज्यादा लोगों ने सराहा और अपनाया। आज शीरोज हैंगआउट अपने दम पर ना सिर्फ अपने कर्मचारियों का वेतन और दुकान का किराया निकाल रहा है, बल्कि अब ये मुनाफे में भी आ गया है।

इसके साथ ही बता दें कि रविवार को ‘दीपिका पादुकोण’ ने अपना जन्मदिन इसकी कैफे में मनाया। 10 जनवरी को दीपिका की फिल्म ‘छपाक’ रिलीज हो रही है जिसमे उन्होंने एसिड अटैक लक्ष्मी का किरदार निभाया है।

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